कोरोना से अब केकड़ा बचाएगा लोगों की जान, केकड़े का नीला खून बनेगा लोगों के लिए अमृत, पढ़े विस्तार से

कोरोना वायरस से इस वक्त पूरी दुनिया परेशान है इस वर्ष में पूरी दुनिया में अपना आतंक मचा रखा है। इस बीमारी से अभी तक कई लाख लोगों की मृत्यु हो गई है तथा असंख्य लोग संक्रमित हैं। दुनिया भर के प्रसिद्ध डॉक्टर वैज्ञानिक इस बीमारी से लड़ने वाली वैक्सीन बनाने में जुटे हुए हैं परंतु आपको बता दें कि अभी तक उनको इस रास्ते पर कोई कामयाबी नहीं मिली है। फिर भी पूरे विश्व के वैज्ञानिक तथा डॉ कोरोना से बचने के दवाओं को बनाने में जुटे हुए हैं।
वैक्सीन ट्रायल के लिए पहले से ही चूहों और बंदरों पर टेस्ट हो रहे थे। अब एक खास तरह के केकड़ों को भी वायरस से लड़ाई में इस्तेमाल किया जाएगा। हॉर्स शू क्रैब नामक इस प्रजाति के केकड़ों का खून पहले से ही मेडिकल साइंस में उपयोग हो रहा है। इससे इस बात की जांच होती है कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरण बैक्टीरिया-फ्री हैं या नहीं। अगर जांच न हो तो लगभग सभी मरीज जानलेवा संक्रमण का शिकार हो सकते हैं।

जानिए, क्या है हॉर्स शू केकड़ा और कैसे ये कोरोना से लड़ाई में हमारी मदद करेगा।

समुद्र की रेतीली खोहों में रहने वाला ये केकड़ा दुनिया के कुछ सबसे पुराने जीवों में से है। माना जाता है कि ये धरती पर डायनासोर (dinosaur) से भी पहले से हैं। 2019 में हुए एक मॉलिक्युलर एनालिसिस में पाया गया कि ये केकड़े इस ग्रह पर 30 करोड़ सालों से भी ज्यादा समय से हैं। यही वजह है कि इन्हें लिविंग फॉसिल्स की श्रेणी में रखा गया। यानी वे जीव, जिनके भीतर ऐसी खूबियां हैं जो सिर्फ फॉसिल (जीवाश्म) हो चुके जंतुओं के रिकॉर्ड में मिलती हैं। विपरीत हालातों के बावजूद करोड़ों साल से सर्वाइव कर रहे हॉर्स शू में कई खासियतें हैं जैसे इसका खून नीले रंग का होता है। हमारे या लगभग सभी स्तनधारियों के खून का रंग लाल हैं क्योंकि इसमें आयरन वाला हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन को यहां से वहां लाता-ले जाता है। वहीं इस अनोखे जीव में आयरन की बजाए कॉपर यानी तांबे के साथ hemocyanin नामक केमिकल होता है जो हीमोग्लोबिन की तरह काम करता है। इसी की उपस्थिति के कारण केकड़े का खून नीला होता है।

केकड़ों के दूधिया-नीले खून में वो तत्व पाया जाता है जो जहरीले पदार्थों को आसानी से पहचान लेता है। उसके खून में इस तत्व को limulus amebocyte lysate (LAL) कहते हैं। ये खासकर एंडोटॉक्सिन को आसानी से पहचान लेता है। एंडोटॉक्सिन वो पदार्थ है जो किसी बैक्टीरिया के खत्म होने पर उसके शरीर से रिलीज होता है। सारे ही एंडोटॉक्सिन इतने खतरनाक होते हैं कि अगर अस्पताल में सर्जरी के किसी उपकरण या इंजेक्शन पर भी इसकी सूक्ष्म मात्रा भी रह जाए तो मरीज की जान जा सकती है। इस केकड़े का खून इसी एंडोटॉक्सिन को पहचान लेता है। पहचानने के बाद केकड़ों के शरीर से एक केमिकल निकलता है जो उस जगह के खून को जमा देता है जो बैक्टीरिया के संपर्क में आया हो। जमे हुए खून के भीतर बैक्टीरिया या जर्म्स कैद होकर मर जाते हैं।

कुल मिलाकर ये समझ सकते हैं कि इनके खून से ये पक्का होता है कि कहीं दवा में या मेडिकल उपकरण में कोई खतरनाक बैक्टीरिया तो नहीं। अब कोरोना के मामले में भी ड्रग जहरीला है या नहीं, ये जांचने के लिए इसकी मदद ली जाने वाली है। बता दें कि तैयार ड्रग्स में कई बार एंडोटॉक्सिन होता है। ये ड्रग देना खतरनाक हो सकता है इसलिए अब बहुत से वैक्सीन को क्रैब के खून से मिलाकर देखा जाएगा कि वो जहरीला तो नहीं।

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