ईद-उल-जुहा: कोरोना की भेंट चढ़ा करोड़ों का कारोबार, चोरी-छिपे बेहद सस्ते दामों में बेचे जा रहे बकरे

केपी त्रिपाठी/मेरठ. हापुड़़ रोड स्थित बकरा पैठ में इस साल सन्नाटा पसरा हुआ है। इसका भी एक ही कारण है और वह है कोरोना। कोरोना महामारी की गाइडलाइन को लेकर प्रशासन की सख्ती के चलते इस बार पश्चिम उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी बकरा पैठ को 50 करोड़ का फटका लगा है। पिछले 10 साल से बकरा पैठ में बकरा बेचने आने वाले पशु व्यापारी ने बताया कि अकेले उसको ही 50 लाख का नुकसान इस बार ईद पर उठाना पड़ रहा है। व्यापारी का कहना है कि जो बकरा 40 हजार का बिकता था। इस बार वो बकरा चोरी-छिपे 10 से 15 हजार रुपये का बेचना पड़ रहा है।

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बता दें कि एक अगस्त को ईद-उल-जुहा है। ईद-उल-जुहा पर कुर्बानी होती है। इसके लिए मुस्लिम लोग अपनी हैसियत के हिसाब से बकरा खरीदकर कुर्बानी करते हैं। रामपुर से प्रतिवर्ष बकरा पैठ में बकरा बेचने आने वाले मुरारी पाल बताते हैं कि वे प्रतिवर्ष 15-20 लाख के बकरे लाकर बेचते थे, जिसमें उन्हें करीब 50 लाख रुपये बच जाते थे, लेकिन इस बार एक बकरे में 70 प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि उन्हें अकेले ही करीब 50 लाख का नुकसान हुआ है।

राजस्थान और गुजरात से आते थे पशु व्यापारी

मेरठ की हापुड़ रोड स्थित बकरा पैठ में राजस्थान, गुजरात, उत्तराचंल, हरियाणा और दिल्ली तक से पशु व्यापारी बकरा, ऊंट, भैस और मेढा बेचने के लिए आते थे। ईद से एक महीने पहले लगने वाली इस पैठ में करोड़ों का करोबार होता था। करीब 1 किमी के दायरे में फैली इस बकरा पैठ में लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता था, लेकिन इस बार अब ईद के चंद दिन ही शेष बचे हैं और गुलजार रहने वाली बकरा पैठ में खामोशी पसरी हुई है। एक अन्य बकरा कारोबारी इमरान कहते हैं कि वे प्रतिवर्ष मेरठ ईद से एक महीने पहले आ जाते थे और इन दिनों में करीब 100 बकरे और भैंसों का व्यापार कर लिया करते थे। कोई भी बकरा 20 हजार से नीचे नहीं होता था और भैंस 15 हजार की। इमरान बताते हैं कि जैसे-जैसे ईद नजदीक आती थी। बकरों के दाम और बढ़ते जाते थे, लेकिन इस बार महामारी के कारण सब कुछ चौपट हो गया है, जिस मौके का पूरे साल इंतजार किया जाता था। वह महामारी की भेंट चढ़ गया है।

कुर्बानी के लिए नहीं मिल रहा पसंदीदा बकरा

कुर्बानी के लिए पसंदीदा बकरा मुस्लिम समाज के लोगों को नहीं मिल रहा है। पैठ लगती थी तो सब लोग वहीं जाकर बकरा खरीदते थे, लेकिन इस बार पसंदीदा बकरा नहीं मिल रहा है। ईद से एक माह पहले से ही बकरीद की तैयारियां शुरू होती थीं। बकरों की खरीद-फरोख्त का सिलसिला भी खूब चलता था। बहुत से बकरे व्यापारी मुस्लिम क्षेत्रों में भ्रमण कर बेचने व खरीदने का काम भी करते थे।

मुस्लिम इलाके के बैंक्वेट हॉल और गोदाम के भीतर हो रही खरीद-फरोख्त

इस बार बकरा पैठ भले ही न लगी हो, लेकिन ईद पर कुर्बानी तो होगी ही। जिन पशु व्यापारियों ने पूरे साल बकरा ईद का इंतजार किया। तैयारियां की वह अब पशुओं को औने-पौने दामों में बेचने के लिए तैयार हैं। यही कारण है कि जो व्यापारी कभी पैठ में आकर बकरा बेचते थे। उन्होंने मेरठ में बैंक्वेट हाल और खाली पड़े गोदामों को किराए पर ले लिया ह। वहीं पर उन्होंने अपने बकरे और अन्य पशु बांधे हुए हैं। वहीं से बकरों का कारोबार चोरी-चुपके कर रहे हैं। बकरा व्यापारियों को अपने व्यापार और पशुओं की चिंता है। अगर इस बार भी ईद पर पशु नहीं बिके तो उनके पेट भरने का संकट खड़ा हो जाएगा।

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