बिहार : "और प्लेट में बचा है बस थोड़ा सा चावल और नमक", खाने की किल्लत और भूख की आग में जल रहे है कचरा उठाने वाले मुसहरी टोला के निवासी, लॉक डाउन के चलते हुए काम ठप

"एक किलो दाल परिवार में कब तक चलती है, वे क्या सोचते है ?..... स्कूल में मध्यान्ह भोजन के बिना हम गांव और सुल्तानगंज में लोगों से भोजन मांगते हैं" ये शब्द हैं खाने कि किल्लत झेल रहे मुसहरी टोला में रहने वाली मीना देवी के उन्होंने कोरोना संकट के दौरान सरकारी योजना के तहत मिले 1 किलो दाल व पांच किलो गेंहू या चावल पर सरकार को जवाब देते हुए कहा। बिहार में भागलपुर जिले में स्थित मुसहरी टोला जहां के निवासी जातिगत भेदभाव और गरीबी के कारण सिर्फ दो काम (कचरों का संग्रह या फिर भीख मांगना) करते थे कोरोना संकट के चलते अब उनका ये भी काम खत्म हो चुका था। टोला के निवासियों का आमदनी का मुख्य स्रोत बंद हो चुका था और अब धीरे धीरे उनके  बचाए हुए पैसे भी समय के साथ कम ही रहे थे और अब खाने कि किल्लत और भूख की आग उनके बच्चो तक पहुंचने लगी थी . राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण द्वारा घोषित क्षेत्र के 48.3 प्रतिशत कुपोषित बच्चो के भी पोषण का मुख्य स्रोत जो कि, स्कूलों में मिलने वाला मिड डे मील था, स्कूलों के बंद होने के कारण बंद हो गया था। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों में बच्चों को मध्यान्ह भोजन में चावल रोटी सब्जी दाल और शुक्रवार को अंडे मिलते थे। लाक डाउन के चलते अब ये भी बंद हो गया है।दीनू मांझी अपने प्लेट में बचे हुए थोड़े से चावल नमक दाल और चोखा ख़तम करते  हुए कहते हैं इसके अलावा अब कुछ नहीं है हमारे पास। स्थानीय निवासी बीरा मांझी ने बताया कि वे अब सिर्फ दो ही बार कचरा इकट्ठा करने जा पाते है। उन्होंने बताया कि कचरा इकट्ठा करने यहां से दो किलोमीटर दूर सुल्तानपुर जाना पड़ता है और प्रतिदिन ठेकेदार से 300 रुपए मिलते है। मेरे बच्चे स्कूल जाने के लिहाज से अभी छोटे है लेकिन वे एक समय के खाने के लिए आंगनबाड़ी जाते थे पर वो भी अब बंद है । टोला के स्थानीय निवासियों के अनुसार एक महीने पहले सरकारी अधिकरियों ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत पांच किलो चावल या गेंहू दिया था लेकिन उसके बाद कोई नहीं आया।

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