आजादी के 73 वर्ष बाद भी उपेक्षित है फ्रीडम फाइटर का गांव, नेहरू जी भी आ चुके हैं यहां

बस्ती. आजादी की लड़ाई में हर मोर्चे पर आगे रहने वाले फ्रीडम फाइटर स्वर्गीय सीताराम शुक्ल उस समय अग्रेजों की निगाह में चढ़ गए, जब 1919 में कांग्रेस के नासिक अधिवेशन में देश को आजाद कराने की रणनीति का प्रस्ताव रखा। वहां से लौटने के बाद बस्ती में कांग्रेस के संस्थापकों में रहने वाले सीताराम शुक्ल ने सभी आंदोलनों को लीड किया और पांच बार जेल गए। आजादी के बाद कप्तानगंज से दो बार विधायक रहे स्व. शुक्ल का गांव आज विकास की बाट जोह रहा है। पंडित सीताराम शुक्ला के पोते मदन शुक्ल, कमल शुक्ला व परपोते अतुल शुक्ल व अमित शुक्ल बताते हैं कि गांव में उनके नाम पर स्मृति द्वार व गांव में प्रतिमा लगना था। लेकिन सड़क का प्रस्ताव ग्राम प्रधान के देने के बाद भी स्वीकृत नहीं हुआ तो प्रतिमा के लिए राजस्व व पुलिस की रिपोर्ट का इंतजार है।

पंडित सीताराम शुक्ल का जन्म सल्टौआ ब्लॉक के भादी खुर्द में रंगनाथ शुक्ल व सूर्यकली के घर 1897 में हुआ। इनका विवाह किशोरी शुक्ला से हुआ। गुलामी की जंजीर इन्हें बर्दास्त नहीं थी तो पति-पत्नी दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन की राह पकड़ ली। 1919 के नासिक अधिवेशन में दिए भाषण से अंग्रेजों की नजर में आ गए।

कई बार जेल भी गये
आजादी की लड़ाई के दौरान पांच आंदोलन में सीताराम शुक्ल ने चार साल तीन माह की सजा काटी। 1922 के असहयोग आंदोलन में एक वर्ष, 1930 के नमक सत्याग्रह में छह माह, 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में छह माह, 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में तीन माह व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दो वर्ष का कारावास हुआ।

सीताराम के घर रुके थे नेहरू जी
19 सितंबर 1921 पंडित जवाहर लाल नेहरू की एक जनसभा गोरखपुर में होनी थी। अंग्रेजों ने सभा निरस्त कर गिरफ्तारी का आदेश दिया। 20 सितम्बर को नेहरू जी सीताराम शुक्ल के घर पहुंचे। यहीं पर गोरखपुर जनपद (जिसमें बस्ती जिला भी शामिल था) की कमेटी का गठन किया। रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को जिला अध्यक्ष, भगवती प्रसाद दुबे को उपाध्यक्ष, प्रसिद्ध आर्य समाजी देवव्रत को महामंत्री तथा सीताराम शुक्ल को सहयोगी बनाया। 1921 में गांधीनगर (पक्का-नगर) में सीताराम शुक्ल के संयोजन में नेहरू जी की एक विशाल जनसभा कराई। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई। नौ अक्टूबर 1929 को बस्ती के गांधीनगर में होने वाली जनसभा में भाग लेने आए नेहरू जी इनके घर पर रुके थे। हालांकि, धारा 144 लागू होने के चलते यह जनसभा निरस्त हो गई थी। नाराज सीताराम शुक्ल ने इसी दिन हथियागढ़ में जनसभा कराई, जिसको महात्मा गांधी व पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संबोधित किया था।

राजकीय सम्मान के साथ हुआ था अंतिम संस्कार
आजादी के बाद 1952 में हर्रैया पूरब से विधायक चुने गए। इसी सीट से 1957 में भी फिर से विधायक निर्वाचित होकर क्षेत्र की सेवा की। 1973 में स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंडित सीताराम शुक्ल एवं उनकी पत्नी किशोरी शुक्ल को दिल्ली बुलाकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रमाण-पत्र व ताम्र-पत्र देकर सम्मानित किया। 2 फरवरी 1977 को लखनऊ के सिविल अस्पताल में उनकी मौत हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका दाह संस्कार कराया।



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