सौदागर सिंह ने किया था चीनी सेना का कत्लेआम, चीनी सैनिकों का मारकर छीन लाए थे एसएलआर, नेहरू ने की थी तारीफ़

आजमगढ़. भारत देश आज सर्व सम्पन्न है। दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए हमारे पास गगनभेदी तोपें, निशाने पर अचूक वार करने वाले लड़ाकू विमान व खतरनाक मिसाइलें हैं। हम परमाणु सम्पन्न देश बन चुके हैं। पर एक समय ऐसा भी था जब दुश्मनों से लोहा लेने के लिये हमारे जांबाज सैनिकों के पास हथियार के नाम पर सिर्फ थ्री नॉट थ्री राइफल के अलावा कुछ नहीं था। एके 47 या एके 56 की बात छोडिये हमने एसएलआर भी नहीं देखी थी। तब आजमगढ़ निवासी भारतीय सेना के एक जवान वीर सौदागर सिंह चीन से युद्घ के दौरान चीनी सैनिकों को मारकर उनकी दर्जन भर एसएलआर राइफलें छीन लाए थे। तब पहली बार भारतीय सेना ने एसएलआर का दीदार किया था।

 

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने जब दुश्मनों से छीनकर लाए हथियार पेश किये गए तो उन्होंने वीर सौदागर सिंह को शाबाशी दी। भारतीय वैज्ञानिकों को वैसे ही हथियार विकसित करने का आदेश दिया। चीन से युद्ध की समाप्ति के बाद हुए भव्य आयोजन में इस विशेष उपलब्धि पर तत्कालीन राष्ट्रपति सर्व पल्ली राधाकृष्णन ने सौदागर सिंह को वीर चक्र से सम्मानित किया आैर उन्हें नायब सूबेदार बना दिया गया। सौदागर सिंह ने पाकिस्तान के साथ जंग में भी हिस्सा लिया। साल 1965 में सौदागर सिंह भारत पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में बड़ी ही वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गये।

 

आजमगढ़-गोरखपुर मार्ग पर सगड़ी तहसील अन्तर्गत जीयनपुर कोतवाली क्षेत्र के ग्राम पूनापार बड़ागांव में छोटे से किसान महातम सिंह व माता बेइली देवी के घर 11 अप्रैल 1926 को एक बच्चे ने जन्म लिया जिसका नाम माता-पिता ने सौदागर सिंह रखा। प्राथमिक शिक्षा कैथौली प्राथमिक पाठशाला और जूनियर हाईस्कूल सगड़ी में पूरी हुई। उसके बाद सौदागर ने पढ़ाई छोड़ दी। घर पर कोई काम नहीं था तो रजादेपुर मठ मेे शौकिया गरीब बच्चों को पढ़ाने लगे। उसी दौरान वर्ष 1946 में उनका विवाह रत्ती देवी से हो गया। पर गृहस्थ जीवन में उनका मन नहीं लगता था। इसी दौरान मठ पर आनेजाने वाले पीएसी के जवान रामशबद सिंह से साहसिक बातें सुनकर सौदागर के मन में भी खाकी वर्दी धारण करने की लालसा पैदा हुई।

 

माता-पिता ने बहुत रोकना चाहा लेकिन वह नहीं रुके और घवालों से नाराज हो गए। वह रामशबद सिंह के आश्वासन पर उनके साथ चल पड़े। साल 1948 मेे मौका मिला तो वे भर्ती केन्द्र फतेहपुर में राजपूत रेजीमेण्ट के सिपाही बन गये। सेना में भर्ती होने के बाद उन्होंने इण्टर की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद चित्तौड़ में सैन्य शिक्षा ग्रहण किया।

 

समय ने करवट बदला तो 1958 में सौदागर सिंह सिपाही से लांस नायक बन गये। इस पद की जिम्मेदारी दो ही साल में निभा पाये थे कि वर्ष 60 मेे हवलदार पद पर प्रोन्नति मिल गयी। उसी दौरान छोटे भाई की शादी पड़ी तो घर के लिए चल दिये। घर पहुंचने पर पिता की तबियत खराब हुई और पिता का साया सिर से उठ गया। कुछ कर गुजरने का जज्बा पालने वाले सौदागर सिंह को वह सुअवसर सन 1962 में उस वक्त मिला जब चीन ने सीमा विस्तार के लिए भारत पर आक्रमण कर दिया। उस समय जयपुर सैैन्य मुख्यालय से उन्हें लद्दाख के लिए कूच करने का आदेश मिला तो वे अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ दुश्मनों का सीना चीरने के लिए चल पड़े।

 

एक तरफ आधुनिक चीनी हथियार और दूसरी ओर मात्र थ्री नाट थ्री की राइफल। फिर भी भारतीय सेना चीनी सैनिकों से लोहा ले रही थी लेकिन दुर्भाग्य कि सौदागर का जत्था चीनियों के घेरे में आ गया। टुकड़ी में शामिल सैनिक भी एक-दूसरे से अलग हो गये। सौदागर सिंह की राइफल ने जवाब दे दिया लेकिन उनका हौसला बरकरार था। बर्फीली पहाडियों की खोह मेे सांस रोके सौदागर को इन्तजार था तो उस क्षण का जब कोई चीनी सैनिक उनके करीब आ जाये। वह मौका भी आ गया और भारतीय फौज पर भारी पडने के अहंकार में चीनी सैनिक इत्मीनान से चक्रमण करते हुए उस पहाड़ी खोह की ओर बढने लगे।

 

राइफल की मैगजीन जाम थी सो पहले आने वाले चीनी सैनिक के सीने मेे अपनी राइफल की जहरीली संगीन घोंपकर उसे मौत के घाट उतार दिया और उसकी एसएलआर गन सौदागर सिंह ने छीन ली। जाम राइफल की जगह हाथ में एसएलआर आर्इ तो फिर क्या पूछना। सौदागर सिंह ने अपने अनुभव से पीछे आ रहे ग्यारह चीनी सैनिकों की सांसों को बर्फीली पहाडियों के बीच ठण्डा कर दिया आैर उनके हथियार समेत लिये। वो 10 दिन तक भूखे-प्यासे पैदल चलकर अपने कमाण्डर के पास पहुंचे। कमाण्डर भी सौदागर और उनके हाथ में एसएलआर देख अवाक रह गया। यह बात पण्डित जवाहर लाल नेहरू तक पहुंची तो उन्होंने एसएलआर मंगवाकर देखा और सौदागर सिंह को शाबाशी दी। उनकी तरक्की कर उन्हें नायब सूबेदार बना दिया गया।

 

चीनियों से मुकाबले को अभी तीन ही साल बीते थे कि साल 1965 में पाकिस्तान ने पैटर्न टैंकों से हमला बोल दिया। उस समय सौदागर सिंह अपने घर आये हुए थे। कम्पनी कमाण्डर का तार मिलते ही वो घर से बहाना बनाकर दुश्मनों को सबक सिखाने चल पड़े। कम्पनी कमाण्डर ने उन्हें छम्म क्षेत्र में जाने का आदेश दिया। छम्म क्षेत्र को पूरी तरह से मुक्त कराने के बाद अगला निशाना लाहौर पर कब्जा था। अपनी टुकड़ी के साथ दो सितम्बर 1965 को सौदागर सिंह आगे बढने लगे। उधर कमाण्डर आदेश पर आदेश दिये जा रहे थे कि आगे मत बढ़ो खतरा है, लेकिन गोलियों और विस्फोटकों के बीच किसी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। इशारों से सैनिक बात कर रहे थे। विस्फोटकों से भरी भारतीय सैनिकों की जीप छम्म से थोड़ी ही दूर आगे बढने के बाद फंस गयी। जीप को बाहर निकालने के बाद सैनिक फिर आगे बढ़े ही थे कि जमीन के अन्दर बिछायी गई बारूदी सुरंग फटने से उनकी जीप के परखच्चे उड़ गए और सौदागर सिंह समेत सभी जवान शहीद हो गए। जीप में सवार शिवमुनि नाम का सिपाही बच गया और वापस भारतीय सीमा में पहुंचकर कम्पनी कमाण्डर को यह दुखद जानकारी दी। उसके बाद मातृभूमि पर खबर पहुंची तो एक तरफ जांबाज के शहीद होने का गम तो दूसरी ओर उसके साहस की बात सुन सबका सीना गर्व से चैड़ा भी हो गया।

 

अफसोस कि इस देश की सरकार और आवाम ने सौदागर सिंह की शहादत को भुला दिया। प्राथमिक विद्यालय में सौदागर सिंह की एक अदद प्रतिमा को छोड़ दे तो भारत मां की रक्षा के लिये अपनी जान न्योक्षावर करने वाले वीर सपूत के नाम पर एक इंट तक नहीं रखी गयी। कुछ ऐसा नहीं जिसे वीर जांबाज शहीद के लिये श्रद्घांजलि कहा जा सके आैर उन्हें याद किया जा सके। सौदागर सिंह की पौत्र वधू अंजना सिंह कहती है कि बाबा ने जिस साहस का परिचय दिया और देश के दुश्मनों से लड़े, हमें उनपर गर्व है। बाबा से प्रेरणा लेकर ही मेरे पति ने भी सेना की नौकरी चुनी, लेकिन अफसोस सिर्फ इस बात है कि सरकार ने कभी सौदागर सिंह को याद नहीं किया। हमें सरकार से किसी तरह की सहायता नहीं चाहिए, लेकिन अगर नेताओं के नाम पर चैराहे और पार्क बन सकते हैं तो शहीद सौदागर सिंह के नाम पर क्यों नहीं।

By Ran VijY Singh



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