बिहार दे रहा है “नीली क्रांति” को मूर्तरूप, मोदी दे रहे सपनों को आकार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 10 सितंबर को बिहारवासियों को करीब 295 करोड़ रुपए की सौगात देंगे. प्रस्तावित कार्यक्रम में मत्स्य, पशुपालन व विभिन्न योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास शामिल है. दरअसल प्रधानमंत्री मोदी भारत में श्वेत क्रांति के बाद हर मंच से देश में “नीली क्रांति” पर बल देते हैं. मोदी सरकार के मैनिफेस्टो में किसानों का आय दोगुनी करने का वादा भी किया गया है. इसके तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक किसानों की आय दोगुना करना है. हालांकि मोदी सरकार भलीभांति इस बात से वाकिफ है कि परंपरागत खेती के अलावा किसानों की निर्भरता के लिए अलग वैकल्पिक आय उपार्जन की व्यवस्था को विकसित करना होगा.

हाल ही में आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत आर्थिक पैकेज में नीली क्रांति यानि मत्स्य पालन को सफल बनाने के लिए मोदी सरकार ने 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि की मंजूरी दी. इसके तहत प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना में मछुआरों और अंतरराज्यीय मछली पालन को बढ़ावा देना मुख्य लक्ष्य है. इसी के मद्देनजर मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल में पिछले वर्ष कृषि मंत्रालय से अलग करके मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी को अलग मंत्रालय के रूप में गठित किया था. केंद्र सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं से संबंधित मंत्रालय का कमान बिहार से केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को सौंपा गया.

दरअसल मछली और मछली पालन बिहार की संस्कृति से जुड़ी हुई है. कई क्षेत्रों में पीढ़ीगत पेशा है. बिहार के मिथिला में मछली को शुभ माना जाता है. माछ-भात पसंदीदा व्यंजन है. अगर बाहर जाना भी हो तो लोग मछली देखना शुभ मुहूर्त मानते हैं. ध्यातव्य है कि एक समय बिहार के अंदर मछली की मांग और उत्पादकता में भारी अंतर था. आज इस क्षेत्र में केंद्र और राज्य सरकार की पहल ने आमूलचूल परिवर्तन किया है.

यद्यपि विगत वर्षों तक मछली उत्पादन में बिहार की निर्भरता दूसरे प्रदेशों पर थी, लेकिन मोदी सरकार की नीली क्रांति और मुख्यमंत्री मत्स्य विकास जैसे योजनाओं ने इस पूरे परिदृश्य को राज्य में बदल कर रख दिया है. आज बिहार के अधिकतर गांवों में औसतन दस से पन्द्रह तालाब देखा जा सकता है. मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से लगातार प्रोत्साहन देने का ही परिणाम है. उल्लेखनीय है एक तालाब बनाने पर सरकार की तरफ से 90 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है. सामान्यतः मछली पालन के लिए एक बड़ा तालाब बनाने में लाख रुपए तक का खर्च आता है. हालांकि लाभ इतना अधिक है कि लोग काम करने से हिचकते नहीं है.

उल्लेखनीय है कि बिहार की गंगा नदी में बचवा, कोसी नदी की मोई, दरभंगा जिले की रोहू और कतला, कुशेश्वरस्थान की भुन् मछली और सोन की रोहू मछली की मांग पूरे देश में रहती है. इन मछलियों के बीज का भी मांग पूरे देश में रहता है. हाल ही में इसका ध्यान रखते हुए केंद्र और राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि इन प्रजातियों के बीज को दूसरे राज्य में भी बिक्री करेगी. इसी कड़ी में राष्ट्रीय मछुआरा दिवस पर बिहार सरकार ने मत्स्य प्रोत्साहन बोर्ड का गठन किया था. इसके अलावा एससी और एसटी श्रेणी के लोगों को नब्बे फीसदी तक अनुदान की व्यवस्था की गई है. वहीं सामान्य श्रेणी के लोगों को पचास फीसदी तक की सहायता मिल सकती है.

आज बिहार में मछली पालन नीली क्रांति की रूप ले रही है. सरकारी सहायता को देखते युवाओं के रोजगार के लिए अपार संभावनाएं भी दिख रही है. ये मछली पालकों को बिहार को मछलीपालन में आत्मनिर्भर बनाने में सहायता करेंगे और वहीं दूसरी तरफ मछली को इस काम में अच्छी आमदनी भी हासिल होगी. देश में मछलीपालन ने अबतक लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को रोजगार दिया है. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार आजादी के बाद से अब तक मछली उत्पादन में दस गुणा की वृद्धी हुई है.

प्रकृति संवर्धन में भी मत्स्य पालन बड़ी भूमिका निभाएगा. मछलीपालन के लिए तालाब निर्माण से जहां लोगों को रोजगार मिलेगा, वहीं भूजल का स्तर बढ़ाने में भी मदद करेगा. ये तालाब सूखे की स्थिति से संघर्ष करने में भी महत्ती भूमिका निभाएंगे. साथ ही बिहार में कुपोषण जैसी भीषण समस्याओं से निपटने में भी काफी मदद मिल रही है. मछली में सुपाच्य प्रोटीन पाया जाता है, जो कि शरीर के लिए उपयुक्त होता है.

वर्ष 2024 तक मछली पालन से जुड़े किसानों की आय दोगुनी करने में मदद भी मिलेगी. इससे श्रमिकों और कृषकों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की नींव मजबूत होगी. मछली पालन से शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में परोक्ष रूप से जुड़े लोगों को रोजगार और आय का अवसर मिलेगा. आज भारत मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में दुनिया में दूसरे स्थान पर है. हमारे देश में प्रथम स्थान पाने की क्षमता है. इसीलिए सरकार ‘नीली क्रांति’ को मूर्तरूप देने के लिए प्रतिबद्ध है.

  • शिव नारायण (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और शोधार्थी हैं)


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