अखिलेश के गढ़ में बिना कप्तान के मोदी सेना से कैसे लड़ेगी सपा!


आजमगढ़. सभी राजनीतिक दल त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को यूपी की सत्ता का सेमीफाइनल मान मैदान में उतरने की तैयारी में है। गांव के मेंबर से लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष तक का चुनाव लड़ने का दावा किया जा रहा है लेकिन अखिलेश यादव के संसदीय क्षेत्र सपा अब तक जिलाध्यक्ष को लेकर फैसला नहीं कर पायी है। जबकि जिला इकाई को भंग हुए एक साल से अधिक का समय बीत चुका है। ऐसे में पार्टी की चुनौतियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। कारण कि बिना कप्तान के पंचायत चुनाव में सपा की राह आसान नहीं होगी। रहा सवाल अन्य दलों का तो वे तैयारी में कहीं न कहीं सपा से आगे निकलते दिख रहे है।

बता दें कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने 23 अगस्त 2019 को सपा की सभी इकाइयों को भंग कर दिया था। उस समय माना जा रहा था कि पार्टी में बड़ा बदलाव किया जाएगा, नये और अनुभवी चेहरों को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। प्रदेश के ज्यादातर जिलों में पार्टी ने जिलाध्यक्ष भी तय कर दिया लेकिन आजमगढ़ में आज तक जिला इकाई भंग पड़ी है।

अध्यक्ष का चुनाव न हो पाने का कारण पार्टी की गुटबंदी मानी जा रही है। हर गुट का अपना एक दावेदार है जिसके कारण प्रदेश इकाई के लिए अध्यक्ष का चयन मुश्किल हो गया है लेकिन इसका असर अब संगठन के कामकाज पर दिखने लगा है। पार्टी विरोध प्रदर्शन का मामला हो या फिर मुद्दों को भुनाने का हर स्तर पर पिछड़ती दिख रही है। इसका पूरा फायदा कांग्रेस उठा रही है। जबकि यह जिला समाजवादी पार्टी का गढ़ कहा जाता है।

गौर करें तो हाल के दिनों में 14 अगस्त को तरवां थाना क्षेत्र के बांस गांव में दलित प्रधान सत्यमेव जयते की हत्या के बाद कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बनया और महाराष्ट्र प्रांत के मंत्री निनित राउत, सांसद पीएल पुनिया सहित कई बड़े नेताओं को मैदान में उतार दिया। खुद प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू आगे बढ़ कर नेतृत्व किया लेकिन सपा शांत नजर आयी। खुद अखिलेश यादव को आगे आकर निर्देश जारी किया तब कहीं जाकर सपाई मैदान में उतरे। जबकि इस हत्याकांड के बाद सरकार लगातार बैकफुट पर थी। इसी तरह एक पखवारे पूर्व जीयनपुर कोतवाली क्षेत्र में दलित के हत्या के प्रयास के मामले को भी कांग्रेस भुनाने में सफल रही और सपा सिर्फ ज्ञापन तक सीमित रह गयी।

जबकि सपा और कांग्रेस दोनों का ही टार्गेट दलित और अति पिछड़ा मतदाता है। जिस पंचायत चुनाव को पार्टी सत्ता का सेमीफाइनल और भाजपा सरकार के अंत की शुरूआत मान रही है उसे बिना दलित और पिछड़ों के सहयोग के जीतना संभव नहीं है। कांग्रेस और बसपा अति पिछड़ों और अति दलितों को साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। वहीं भाजपा इन्हें अपने पाले में बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है लेकिन सपा सिर्फ बयानबाजी तक सीमित दिख रही है।

इसका प्रमुख कारण जिला इकाई का भंग होना माना जा रहा है। कारण कि पार्टी के पास जिले में कोई नेतृत्व ही नहीं है। वहीं गुटबाजी चरम पर है। पार्टी के लोग कई घड़ों में बंटे हुए है। हर कोई अपने खास को जिलाध्यक्ष बनाने के लिए परेशान है। इसलिए संगठन के कामों में रूचि नहीं ले रहा है। पार्टी प्रदेश इकाई भी संगठन को लेकर कोई निर्णय नहीं ले पाया है। इसका नुकसान पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ सकता है।

BY Ran vijay singh



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