बाराबंकी में न्यू इंडिया का किसान उन्नत खेती से बना करोड़पति, खुद लिखी अपनी सफलता की कहानी

बाराबंकी. आज किसानों की आय दोगुनी होने की बात हो रही है और सरकार इस दिशा में योजनायें भी बना रही है, लेकिन इन सब बातों से दूर बाराबंकी का एक किसान अपनी सफलता की कहानी खुद लिख रहा है। यह सिर्फ खेती से खुद को करोड़पति ही नहीं बना रहा बल्कि आसपास के अन्य लोगों को भी अपनी तकनीक से परिचित करा कर उन्हें स्वावलम्बी और धनाड्य बनाने का भागीरथी प्रयास भी कर रहा है। यह युवा किसान न किसी सरकार के सहारे है और न उनसे किसी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा करता है, क्योंकि इसे अपनी तकनीक और मेहनत पर पूरा भरोसा है। उसी के दम पर आज यह खेती में नए-नए कीर्तिमान स्थामित कर रहा है।

चर्चा में दौलपुर गांव

उत्तम खेती मध्यम बान, नीच चाकरी कुक्कर निदान अर्थात उत्तम खेती (कृषि कार्य) हमारे समाज में सर्वोत्तम कार्य है, मध्यम बान (व्यापार) को मध्यम स्तर का काम कहा गया है। महाकवि घाघ की यह कहावत आज बाराबंकी के दौलतपुर का एक किसान सच साबित कर रहा है। दौलतपुर यानी कभी अमिताभ बच्चन की जमीन को लेकर सुर्खियों में रहने वाला गांव फिर चर्चा में है। चर्चा की वजह फिर खेत हैं, लेकिन इस बार बात किसानों की हो रही है। दौलतपुर गांव का एक किसान अपने खेतों में मुनाफे की फसल की वजह से इस गांव को फिर चर्चा में ले आया है, इस नौजवान की खेती को देखने कई जिलों से लोग आते हैं।

किसानों के लिए बने आदर्श

लखनऊ विश्वविद्यालय और फैजाबाद से पढ़ाई करने वाले अमरेंद्र प्रताप सिंह बाराबंकी में सूरतगंज ब्लॉक के दौलतपुर गांव में केले, तरबूज, मशरूम, खरबूजा, हल्दी और खीरा समेत करीब एक दर्जन फसलों की खेती करते हैं। इस इलाके के बाकी किसानों की तरह उनके घर में पारंपरिक तरीकों से खेती होती थी, लेकिन जिस अनुपात में खेती थी, उसके मुकाबले आमदनी काफी कम थी। लेकिन 3-4 साल पहले जबसे उन्होंने खेती की कमान संभाली, उसके मायने और मुनाफे के नंबर बदल गए हैं। पहले जहां पूरे साल में 15-20 लाख रुपए मिलते थे, अब एक फसल ही इतने रुपए देकर जाती है। अमरेन्द्र आज अपनी पारिवारिक तौर पर की जाने वाली पारम्परिक खेती से इतर नयी खेती, नयी तकनीक के साथ करके किसानों के लिए आदर्श बनने की ओर अग्रसर हैं।

परिवार वालों ने किया था मना

अमरेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि वह राजधानी लखनऊ में रहते थे और जब उन्होंने खेती में पैर जमाने का मन बनाया तो परिवार और सभी हितैषियों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वहीं रहकर कोई व्यापार करो, गांव आने का इरादा अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के समान है, लेकिन उन्हें अपना भविष्य गांव में ही दिखाई दे रहा था और उसने गांव वापसी की ठान ली। गांव आकर उसने पहले गांव की फिर बाहर की खेती को जाना समझा और लोगों से राय ली। तरह-तरह की मिली राय से अलग उसने अपनी खुद की राय बनाई और फल, सब्जी और औषधीय खेती करने की ठान ली, जिसके परिणाम काफी बेहतर निकले।


सहफसली खेती की बनाई योजना

अमरेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि कभी-कभी दैवीय आपदा और बेमौसम की मार से खेती में जो परिणाम वह चाहते हैं, वो नहीं मिल पाते। मगर इसके लिए सहफसली खेती की योजना बनाई, जिससे कई खेती एक साथ की जाए। अगर एक फसल में नुकसान होता है तो दूसरी फसल उसकी भरपाई कर दे। उनका यह प्रयोग भी काफी सफल रहा और अच्छे परिणाम दे रहा है। जैसे यदि केले में नुकसान हुआ तो उसकी सहफसली हल्दी उसकी भरपाई कर दे या पपीते में नुकसान हुआ तो केला उसकी भरपाई पर दे। इसके अलावा औषधीय खेती के साथ-साथ मशरूम की खेती भी उन्हें अच्छा मुनाफा देती है। दौलतपुर के अन्य ग्रामीण भी अमरेन्द्र की तकनीक पर गर्व करते हैं और बताते हैं कि वह उनकी खेती से काफी कुछ सीखते हैं।



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