गाड़ियों में लगे एक्सपायर्ड सिलेंडर बनते हैं हादसे की वजह, हाइड्रोलिक टेस्ट न कराने पर होता है नुकसान

लखनऊ. शहर में 40 हजार से ज्यादा ऐसे सीएनजी वाहन हैं जिनका हाइड्रोलिक टेस्ट नहीं कराया गया है। यह कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकता है। दरअसल, हाइड्रोलिक टेस्ट वाहन में तरल आपूर्ति के रूप में कार्य करता है और परीक्षण के लिए आवश्यक प्रवाह, दबाव और तापमान पर आवश्यक तरल की आपूर्ति करने के लिए समायोजित किया जाता है। अगर हाइड्रोलिक टेस्ट न कराया जाए तो आग लगने की संभावना बढ़ जाती है। राजधानी लखनऊ में गत महीनों में कई वाहनों में आग लगने के कारण घटनाएं हो चुकी हैं।

गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है। ऐसे में आग लगने की संभावना बढ़ जाती है। दरअसल, सिलिंडरों को हाइड्रोलिक टेस्ट से गुजरना होता है, जिससे उनकी क्षमता का पता लगाया जा सके। लेकिन कई वाहन चालकों को इसकी जानकारी नहीं होती। लापरवाही भी इसका एक बड़ा कारण है। टेस्ट न कराने से आए दिन सिलिंडरों में रिसाव और दूसरी वजहों से आग लगने की संभावना बनी रहती है। सीएनजी बेहद ठंडी गैस होती है। लंबे समय तक बिना जांच कर सिलिंडर का इस्तेमाल करने से उसकी चादर कमजोर हो जाती है क्योंकि नमी के कारण सिलेंडर की बाहरी परत कमजोर हो जाती है। इसलिए समय-समय पर हाइड्रोलिक टेस्ट कराया जाता है, जिससे कि पता लग सके कितना दबाव रह सकता है। इससे लीक का भी पता लगाया जा सकता है।

बढ़ रहे सीएनजी वाहन के आंकड़े

लखनऊ में सीएनजी वाहनों की संख्या करीब 40 हजार पार है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सीएनजी वाहनों को प्राथमिकता दी जा रही है। अब तक करीब 35 सीएनजी पंप राजधानी में सीएनजी भर रहे हैं। मगर तेजी से बढ़ रहे वाहनों की निगरानी के लिए तंत्र सक्रिय नहीं है। ज्यादातर सेंटरों में कम संख्या में ही टेस्ट किए जाते हैं। शहर में 19 सीएनजी रिफिलिंग स्टेशन बनाए गए हैं। मगर इन स्टेशनों पर भी अधिकतर सन्नाट ही पसरा रहता है। सीएनजी पंपों पर सिलेंडरों की जांंच नहीं की जाती। जबकि सीएनजी सिलिंडरों का नियमित टेस्ट कराना चाहिए। नियम मुताबिक व्यवसायिक वाहनों का प्रत्येक दो साल पर और निजी वाहनों का तीन साल पर हाईड्रोलिक टेस्ट कराना अनिवार्य है।

25 से 26 फीसदी कम होता है पॉल्यूशन

पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों की तुलना में सीएनजी से चलने वाले वाहनों से प्रदूषण कम होता है। सभी तरह की विषैली गैस का उत्सर्जन सीएनजी वाहनों में प्रति किमी 25 से 65 प्रतिशत तक कम हो जाता है। ऐसे में वाहनों से निकलने वाले धुंए में शामिल कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन का उत्सर्जन (Reduced Emission) कम होने से यह वातावरण में कम हो जाते हैं। इससे प्रदूषण घटता है।

ये भी पढ़ें: हवा में उड़ रहे प्लेन का इमरजेंसी गेट खोलने लगा यात्री, सीआइएसएफ ने लिया हिरासत में

ये भी पढ़ें: गैस रिफिलिंग से मारुति वैन में आग, बग्गी व स्कूटी हुए खाक