आजमगढ़ के बाबू विश्राम राय ने चंद्रशेखर के लिए खोला था संसद का दरवाजा

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह जिन्होंनें सत्ता के बजाय देश और आवाम के लिए सदैव संर्घष को प्राथमिकता दी। आपातकाल के समय जब कोई प्रधानमंत्री इंदिरागाधी के खिलाफ आवाज उठाने की साहस नहीं जुटा पाया उस समय भी चंद्रेशखर सिंह ने विरोध की आवाज बुलंद की। आजीवन समाजवाद को आगे बढाने का प्रयास किया। इसके लिए मौका आने पर उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने में भी थोड़ा संकोच नहीं किया और ना ही जोड़तोड़ की सरकार बनाने की कोशिश। चंद्रशेखर सिंह का पूरा जीवन संघर्षो से भरा रहा। उनकी जयंती आज प्रेरणा दिवस के रुप में मनायी जाएगी।

आजमगढ़ मंडल के बलिया जनपद के इंब्राहिमपुर में जन्मे 17 अप्रैल 1927 को जन्मे चंद्रशेखर सिंह किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परस्नातक की डिग्री हासिल की। वे शुरू से ही प्रतिभावान थे। इन्हें आचार्य नरेंद्रदेव का बहद करीबी माना जाता था। चंद्रशेखर सिंह कभी संघर्ष से पीछे नहीं हटे बल्कि विपरीत परिस्थितियों का डटकर सामना किया। आजमगढ़ जनपद से उनका गहरा लगाव था।

साठ सत्तर के दशक में ही चंद्रशेखर सिंह ने संघषों के दम पर वह मुकाम हासिल कर लिया था कि बड़े नेते उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1962 जिले के बाबू विश्राम राय को सोसलिस्ट पार्टी द्वारा राज्यसभा का टिकट दिया गया लेकिन उन्होंने यह कहकर टिकट लौटा दिया था कि चंद्रशेखर जी युवा, ऊर्जावान व संघर्षशील नेता है। देश को ऐसे युवाओं की जरूरत है इसलिए उन्हें टिकट दिया जाय। इस प्रस्ताव पर ही पहली बार 3 अप्रैल 1962 को चंद्रशेखर राज्यसभा सदस्य चुने गये थे।

प्रधानमंत्री लाल बहादुार शास्त्री के निधन के बाद जब राजनीतिक माहौल गर्म हुआ तो उस समय चंद्रशेखर सिंह के नेतृत्व में यंगटर्फ नाम की युवा सांसदों की टोली बनायी गई थी। इसके पूर्व चंद्रशेखर सिंह को सार्वाधिक योग्य सांसद का सम्मान भी दिया गया था। वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान जब कोई नेता इंदिरा गांधी का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।

उस समय चंद्रशेखर सिंह ने उनका खुलकर विरोध किया और अन्य नेताओं के साथ जेल गये। जेल से लौटने के बाद वर्ष 1977 में जनता पार्टी के अध्यक्ष बने और सरकार की तानाशाही का डटकर मुकाबला किया। यही नहीं वर्ष 1983 में इन्होंने कन्याकुमार से लेकर दिल्ली में बापू की समाधि तक पदयात्रा की। अमीरों एवं पूंजीपतियों के विरोध के अदम्य साहस के चलते इन्हें युवातुर्क की उपाधि दी गयी। वीपी सिंह के बाद 10 नवंबर 1990 को वे देश के प्रधानमंत्री बने यह अलग बात है कि उनका कार्यकाल काफी छोटा रहा और 21 जून 1991 को उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़नी पडी। पूर्व प्रधानमंत्री ने समाजवादी जनता दल का गठन भी किया था। कैंसर के चलते आठ जुलाई 2007 को उनका निधन हो गया। पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर जहानागंज रामपुर में चंद्रशेखर स्मारक ट्रस्ट की स्थापना की गयी है। यहां उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित है। हर साल चंद्रशेखर सिंह की जयंती और पुण्यतिथि पर यहां भव्य कार्यक्रम का आयोजन होता है। इस बार कोरोना संक्रमण को देखते हुए उनकी जयंती प्रेरणा दिवस के रुप में सादगी पूर्ण ढंग से मनायी जाएगी।

BY Ran vijay singh