ठंडी पड़ने लगी किसान आंदोलन की आंच तो संयुक्त किसान मोर्चा ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी, बातचीत फिर से शुरू करने की मांग की

कोरोना संकट के बीच केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग के साथ किसान दिल्ली बॉर्डर पर अभी भी आंदोलन पर जमे हुए हैं. लेकिन कई दौर की असफल बातचीत, किसानों का अड़ियल रवैया और 26 जनवरी को किसानों द्वारा हुई हिंसा के बाद सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए बातचीत की कोई भी पहल नहीं की. किसान आंदोलन की खबरें धीरे धीरे मीडिया से भी गायब हो गई और 26 जनवरी की हिंसा के बाद तो लोगों के दिलों से भी उतर गया. इसी बीच कई किसान आंदोलन से वापस लौट गए. बॉर्डर का खालीपन साफ़ बता रहा है कि आंदोलन की आंच धीमी पड़ रही है. शायद यही सब देख कर संयुक्त किसान मोर्चा ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिख कर फिर से बातचीत शुरू करने की मांग की है.

संयुक्त किसान मोर्चा ने शुक्रवार को पीएम मोदी को पत्र लिखकर कहा कि किसान महामारी में किसी के भी स्वास्थ्य को खतरे में नहीं डाल रहे, लेकिन वे आंदोलन को भी नहीं छोड़ सकते, क्योंकि यह जीवन-मृत्यु और आने वाली पीढ़ियों का का मामला है. चिट्ठी में किसान नेताओं ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते सरकार को परिपक्वता दिखानी चाहिए और किसानों की मांगों पर विचार करना चाहिए. किसानों द्वारा खारिज किए गए कानूनों को लागू करना देश के लोकतांत्रिक और मानवीय लोकाचार के खिलाफ है. संयुक्त किसान मोर्चा शांतिपूर्ण आंदोलन में विश्वास रखता है और शांतिपूर्ण विरोध जारी रखेगा. 

गौरतलब है कि किसानों के साथ कई दौर की बातचीत के दौरान सरकार ने काफी लचीला रुख अपनाया और कानूनों में संशोधन की बात कही लेकिन किसान नेता अड़ियल रुख अपनाते हुए इन कानूनों की वापसी पर अड़े हैं. जबकि सरकार का कहना है कि ये इस क़ानून पर आपत्ति सिर्फ दो राज्यों के किसानों को है जबकि पूरे देश में कहीं भी विरोध प्रदर्शन नहीं है. आपको बता दें कि पंजाब, हरियाणा औ पश्चिमी यूपी के किसान ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं.