Sunday Special: प्राण और राजेश खन्ना को एक साथ फिल्म में लेने से क्यों घबराते थे निर्माता-निर्देशक, जानिए सदी के खलनायक की कहानी

Sunday Special: प्राण और राजेश खन्ना को एक साथ फिल्म में लेने से क्यों घबराते थे निर्माता-निर्देशक, जानिए सदी के खलनायक की कहानी

Sunday Special: प्राण और राजेश खन्ना को एक साथ फिल्म में लेने से क्यों घबराते थे निर्माता-निर्देशक, जानिए सदी के खलनायक की कहानी

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के बारे में तो लगभग सभी लोग जानते हैं लेकिन क्या आप सदी के खलनायक के बारे में जानते हैं। ये वो खलनायक था जिसकी कुटिल मुस्कान और आंखों से घूर देने मात्र से ही दर्शकों में खौफ पैदा हो जाता था। लोगों ने इस खलनायक के नाम से अपने बच्चों के नाम रखने बंद कर दिए थे। आज की कहानी है वेटेरन एक्टर प्राण की। उनका फेमस डायलॉग 'बरखुरदार' हिंदी सिनेमा को आज भी उनकी याद दिला देता है। पुरानी दिल्ली में जन्म लेने वाले प्राण का ज्यादातर वक्त लाहौर में गुजरा। उनका पूरा नाम 'प्राण कृष्णा सिकंद' (Pran Krishan Sikand) था जो फिल्मों में आने के बाद सिर्फ प्राण रह गया था। दिल्ली में उनका परिवार बेहद समृद्ध था। प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार रहे और उनका फेवरेट सब्जेक्ट गणित हुआ करता था। उनके पिता भी इंजीनियर थे।


कुछ इस तरह हुई पंजाबी फिल्मों में एंट्री

ये तो सब जानते हैं कि प्राण को पान खाने का शौक था और इसी शौक ने उन्हें फिल्मों तक पहुंचा दिया। कहा जाता है कि प्राण को फिल्मों में उनका पहला रोल भी उनके पान खाने के शौक के कारण मिला। खबरों के मुताबिक एक रोज प्राण लाहौर में पान की दुकान पर खड़े थे तभी उनकी मुलाकात लेखक वली मोहम्मद वली (Wali Mohammad Wali) के साथ हुई। साल 1940 में मिली उनकी पहली फिल्म 'यमला जट' (Yamla Jat) भी इस मुलाकात के कारण मिली। प्राण के घर वाले उनके एक्टिंग करियर के सख्त खिलाफ थे। लेकिन प्राण अपने घरवालों को इस बात की खबर दिये बगैर फिल्मों में काम करते रहे। जब पहली बार प्राण का इंटरव्यू अखबार में छपा तब उन्होंने अपनी बहन से विनती की कि इस बात की खबर उनके पिता जी को न चले। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद पिता जी को इस बात का पता चल ही गया। उनकी पंजाबी फिल्में अच्छी चल रही थी कि देश का बंटवारा हो गया। 14 अगस्त साल 1947 में प्राण लहौर छोड़ककर मुंबई आ गए। लाहौर छोड़ने के बाद उनकी दो फिल्मे 'तराश' और 'खानाबदोश' सिर्फ पाकिस्तान में ही रिलीज हुईं थी।

विलेन हिंदी सिनेमा में प्राण की पहचान

मुंबई पहुंचने और फिल्में मिलने से पहले उन्होंने एक्टिंग के अलावा दूसरी नौकरियां भी की। लेखक सादत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) और एक्टर श्याम (Shyam) की बदौलत उन्हें अपनी पहली हिंदी फिल्म 'जिद्दी' (Ziddi) में काम मिला था। इसके बाद प्राण ने हिंदी सिनेमा में अपनी एक विलेन की मजबूत पहचान बनाई। प्राण ने बतौर नायक कुछ ही फिल्में की थी। जब उनके सिर्फ खलनायक बनकर रहने पर सवाल किये गए। तो उनका जवाब था, 'मुझे पेड़ो के चारो तरफ घूम-घूम कर नाचना नहीं पसंद है और मुझसे नाचा भी नहीं जाता। खलनायकी में जो रौब होता है वो नायकी में नहीं होता है।' अपने एक्टिंग से प्यार के चलते राज कपूर (Raj Kapoor) की खस्ता हालत को देखते हुए फिल्म 'बॉबी' (Bobby) के लिए मात्र 1 रु फीस के तौर पर लिया था। जबकि प्राण की उन दिनो सबसे महंगे कलाकारों में गिनती होती थी।


प्राण, राजेश खन्ना और सदी के महानायक के किस्से 

60 और 70 के दशक का टाइम ऐसा था कि फिल्म निर्माता और निर्देशक उन्हें और सुपरस्टार राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) को अपनी फिल्मों में एक साथ लेने से घबराते थे। उनका मानना था कि दोनो को एक साथ फिल्म में लेने से प्रोडक्शन की लागत बढ़ जाती है और पूरा बजट बिगड़ जाता है। दरअसल कहा ये जाता है कि प्राण अपनी फिल्मों के लिए हीरो से भी ज्यादा फीस लेते थे। उस समय मात्र राजेश खन्ना ही एक ऐसे स्टार थे जो प्राण से ज्यादा फीस लेते थे। एक वक्त था जब प्राण का मेहनताना सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से भी ज्यादा हुआ करता था। वो प्राण ही थे जिन्होंने फिल्म 'जंजीर' (Zanjeer) के लिए अमिताभ बच्चन की सिफारिश प्रकाश मेहरा (Prakash Mehra) से की थी। जंजीर की कहानी उस समय कई और एक्टर्स को ऑफर की गयी थी। राजकुमार (Rajkumar) ने इस फिल्म को यह कहकर ठुकरा दिया था कि मेरी ही कहानी मुझे ही सुनाने आए हो। दरअसल राजकुमार फिल्मों में आने से पहले पुलिस इंस्पेक्टर हुआ करते थे और इस फिल्म का नायक भी एक पुलिस वाला था। प्राण फिल्म 'जंजीर' में 'शेरखान' के अहम किरदार में नजर आए थे। फिल्म में 'शेरखान' के गेटअप को भी प्राण ने खुद ही तैयार करवाया था। बता दें कि प्राण को मेकअप की अच्छी समझ थी वह अपने मेकअप पर खुद काम करते थे। वह अपने घर में एक चित्रकार रखते थे जो उनके मनचाहे लुक को बनाता रहता था। इसके बाद उनके मेकअप आर्टिस्ट और लुक बनाने वाले उस लुक पर काम करते थे। 'गुमनाम', 'परवरिश', 'जंजीर', 'डॉन' और 'शहीद' में उनके लुक को काफी पसंद किया गया।

सदी के खलनायक के फिल्मी और निजी जीवन के सफर का अंत

1998 में, 78 वर्ष की आयु में, प्राण को दिल का दौरा पड़ा, जिसके बाद उन्होंने उम्र से संबंधित समस्याओं के कारण फिल्म के प्रस्तावों को मना करना शुरू कर दिया। लेकिन 1990 के दशक में, अमिताभ बच्चन ने प्राण से उनके होम प्रोडक्शन तेरे मेरे सपने (Tere Mere Sapne) (1996) और मृत्युदाता (Mrityudata) (1997) में भूमिकाएं करने का अनुरोध किया। प्राण ने अपने करियर में मुश्किल समय में बच्चन की मदद करने के लिए उनमें अभिनय करके एक अपवाद बनाया। जहां 1997 में, 'मृत्युदाता' में उन्होंने अपना काम कांपते हुए पैरो पर किया वहीं फिल्म 'तेरे मेरे सपने' में, उनके साथ उनके शॉट्स व्हीलचेयर पर लिए गए थे। 2000 के बाद, उन्होंने कुछ गेस्ट अपीरियंस निभाई। साल 2001 में भारतीय सरकार ने उन्हें पद्म भूषण अवॉर्ड (Padma Bhushan Award) से सम्मानित किया गया। जिसके बाद साल 2013 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार (Dadasahab Phalke) भी दिया गया। 12 जुलाई 2013 में उनका मुंबई में निधन हो गया।