गोंड – भारत की सबसे बड़ी जनजाति

गोंड जनजाति भारत की सबसे प्राचीन और सर्वाधिक उपवगों में विभाजति जनजाति है। इनका इतिहास भारत को विश्व में गौरवान्वित करता है ये अपने कलाकृति और सभ्यता की वजह से विश्व में अपना स्थान आज भी बनाए हुये है

2011 की जनगणना कहती है कि देश में गोंड जनजाति की कुल आबादी 11,344,629 है। इसके अनुसार कुल गोंडी भाषी आबादी, 2,713,790 है। 2021 में इनकी आबादी 13 मिलियन के आस पास है, लेकिन गोंड समुदाय के नेताओं और पर्यवेक्षकों के अनुसार, वास्तविक संख्या बहुत अधिक हो सकती है, इस तथ्य को देखते हुए कि गोंडी भाषी लोगों की बड़ी संख्या मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थित है; इन क्षेत्रों में, कोई जनगणना नहीं होती है। बात अगर आकड़ों की करे तो देश की राजधानी दिल्ली में गोंड आबादी लगभग हजारों में है परंतु यहाँ के गोंडो मूलभूत निवासी के रूप में सरकार की नज़र से आज भी ओझल है।

दिल्ली गोंड बस्ती के अध्यक्ष मनोहर राजगोंड का कहना है कि पार्टी द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के आधार पर, गोंडी के साथ उनकी पहली भाषा के रूप में कुल 20 मिलियन लोगों की संख्या है। “चूंकि हमारे सर्वेक्षण की भी, उनकी सीमाएं हैं, वास्तविक संख्या इस आंकड़े से ऊपर हो सकती है परंतु कम नहीं। “मनोहर का कहना है की दिल्ली के वह मूल निवासी है कई बरसों पहले उनके पूर्वज मध्य भारत से दिल्ली आ गए थे।”

भारत कोश से फ़ोटो ली गई है
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गोंड आदिवासी समुदाय के सामाजिक और राजनीतिक समूहों को लगता है कि उनकी भाषा को भारत सरकार द्वारा अनदेखा कर दिया गया है। अन्य भाषाओं के विपरीत जो एक मानकीकरण प्रक्रिया से गुजरी है परंतु संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल नहीं हैं। वही दूसरी ओर गूगल द्वारा गोंडी को अंतरराष्ट्रीय भाषा में शामिल किया गया है, लिपिबद्ध के साथ इसका यूनिकोड भी तैयार किया गया है, गूगल के साथ न्यूजीलैंड की कंपनी ने इस विषय पर कार्य किया। ये गोंड जनजाति के लिए गरिमा की बात है।   

“भारत में अनुसूचित भाषाओं में से इतनी बड़ी संख्या में वक्ताओं का दावा नहीं किया जा सकता हैं,” गोंड समाज के उपअध्यक्ष अनारे अनिल  कहते हैं। “फिर भी सरकार ने इस भाषा को भारतीय संविधान के 8 अनुसूची में शामिल नहीं किया है।” यहां तक ​​कि 2.7 मिलियन का आधिकारिक आंकड़ा डोगरी, बोडो और मणिपुरी जैसी भाषाओं के बोलने वालों की संख्या से अधिक है, फिर भी इन्हें अनुसूची में शामिल किया गया है, ये एक गंभीर प्रश्न है।

2011 की जनगणना के अनुसार, गोंड, जो द्रविड़ परिवार से संबंधित थे, वो आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल राज्यों में अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है। इनकी सबसे बड़ी संख्या भारत के मध्य भाग में केंद्रित है, जिसे गोंडवाना के रूप में आदिवासी समूहों के बीच जाना जाता है, जिसमें सतपुड़ा पठार, नागपुर मैदानी क्षेत्र का एक हिस्सा और नर्मदा घाटी शामिल हैं।

“यह विशाल भौगोलिक क्षेत्र भी इस भाषा को गंभीरता से लेने के पक्ष में एक बड़ा तर्क रखते है,” फागुल कोलसते कहते हैं। “देश में चार राज्यों में गोंडी बोलने वालों की प्रमुख सांद्रता है, और वे 14 से कम राज्यों में फैले हुए हैं।” विशाल आबादी वाला ये समाज आज भी अपने आस्तिव की लड़ाई लड़ रहा है,

गोंडी भाषा, गोंड जनजाति के सदस्यों द्वारा बोली जाती है, लेकिन जनगणना के आंकड़ों में गोंडी के समान भाषाएं भी शामिल हैं, और जनजातियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं, जो गोंडों के समान क्षेत्रों में रहती हैं, जैसे कि मडिया, मुरिया, डोरली और गोंडा।; इन भाषाओं को गोंडी भाषाओं का समूह माना जाता है। गोंडी, जैसा कि आज कहा जाता है, संबंधित राज्यों में बोली जाने वाली अन्य स्थानीय भाषाओं से काफी प्रभावित है। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश में बोली जाने वाली गोंडी “तेलुगु गोंडी” के रूप में जाना जाता है, दिल्ली में बोली जानी वाली “दिल्ली गोंडी” भाषा में काफी बदलाव देखने को मिलते है, हालांकि मानकीकरण की अनुपस्थिति में, बोली में भिन्नताएँ लोगो को एक-दूसरे के साथ संवाद करना मुश्किल बना देती हैं। यही स्थिति गोंडी लिपि की है। यह अनोखी लिपि, जो शायद उर्दू के अलावा देश की एकमात्र लिपि है, जिसे दाएं से बाएं लिखा जाता है, परंतु स्थानांतरण के कारण इस भाषा का आस्तिव्व खतरे में है।

हालाँकि, सरकारी उपेक्षा के कारण, यह लिपि भी, विवाद में पड़ रही है। उदाहरण के लिए, घुमंतू राजगोंड द्वारा दिल्ली के कुछ हिस्सो में बोली जाने वाली गोंडी भाषा मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में बोली जाने वाली गोंडी भाषा से मिलती जुलती है। परंतु दिल्ली में रहने के कारण भाषा का बदलाव होना निश्चित है।

हाल के वर्षों में, भारत के सबसे बड़े आदिवासी समूह की भाषा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया है। एक दशक से लिपि और बोली जाने वाली भाषा को लोकप्रिय बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे कुछ शिक्षित गोंडों को इसका पर्याप्त लाभ मिल रहा है ताकि वे लिख पढ़ सकें। गोंडी वर्णमाला, व्याकरण और उपयोग पर पुस्तकें दिखाई दी हैं, निरंतर कुछ बर्षों से नेशनल लॉं यूनिवरसिटि द्वारा गोंड भाषा पर कार्य किया जा रहा है “डॉ प्रसन्नन्शु के अनुसार दिल्ली की गोंडी भाषा का बदलता स्वरूप आने वाले पीढ़ी के लिए व्याकरणिक समस्या उत्पन्न करेगा।” नेशनल लॉं यूनिवरसिटि मेंगोंडी भाषा के शब्दकोशों को भी संकलित किया गया है। मोबाइल फोन पर भारत के पहले सामुदायिक रेडियो सीजीनेट स्वरा ने मानकीकरण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया। लेकिन यह सब सिर्फ एक शुरुआत है। सक्रिय सरकारी समर्थन के बिना, भारत में सबसे बड़े वन-निवास जनजातीय समूह की आकांक्षाओं से जुड़ी एक अनोखी भाषा खुद को पुनर्जीवित करने में बहुत अधिक असमर्थस है।

— रिमझिम सिन्हा शोधार्थी
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा